
आज इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का स्मृति दिवस मनाया जा रहा है। सद्दाम हुसैन का धर्म मुस्लिम था, लेकिन वे खोखर गोत्र के जाट बताए जाते हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि वे एक स्वाभिमानी और साहसी व्यक्तित्व के धनी थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति, विशेषकर अमेरिका, द्वारा गलत तरीके से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया गया।
समर्थकों के अनुसार सद्दाम हुसैन ने अपने देश की संप्रभुता और आत्मसम्मान के लिए अंत तक संघर्ष किया। वर्ष 2003 में इराक युद्ध के दौरान उन्होंने किसी बाहरी शक्ति से मदद लेने के बजाय पूरे विश्व के जाट समाज से सहयोग का आह्वान किया था।
भारत-इराक शिष्टमंडल से जुड़ा प्रसंग
वर्ष 2003 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में भारत से एक शिष्टमंडल इराक गया था। इस शिष्टमंडल में बागपत से सांसद चौधरी सोमपाल शास्त्री भी शामिल थे।
बताया जाता है कि परिचय के दौरान सद्दाम हुसैन ने “शास्त्री” शब्द सुनकर उनसे उनका परिचय पूछा। जब सोमपाल शास्त्री ने स्वयं को जाट बताया, तो सद्दाम हुसैन ने उन्हें गले लगाते हुए कहा कि वे स्वयं भी जाट हैं।
इस दौरान जहां शिष्टमंडल के अन्य सदस्य सरकारी आवास में ठहरे, वहीं चौधरी सोमपाल शास्त्री को सद्दाम हुसैन ने अपने महल में ठहराया।
धर्म और जाति पर सद्दाम का बयान
अगले दिन एक मुस्लिम प्रतिनिधि द्वारा इस पर सवाल उठाए जाने पर सद्दाम हुसैन ने कहा कि
“धर्म पूजा-पाठ का तरीका है, जो बदला जा सकता है, लेकिन खून की पहचान नहीं बदलती।”
यह प्रसंग बाद में वर्ष 2007 के एक जाट सम्मेलन में चौधरी सोमपाल शास्त्री द्वारा साझा किया गया था।
स्मृति दिवस पर संदेश
स्मृति दिवस के अवसर पर जाट समाज के लोगों ने सद्दाम हुसैन को एक ऐसे नेता के रूप में याद किया, जिन्होंने धर्म से ऊपर जातीय पहचान और स्वाभिमान को महत्व दिया। समाज के वक्ताओं ने जाट समाज से आपसी सम्मान और एकता बनाए रखने का आह्वान किया।



